उत्तर-पश्चिमी दिल्ली का शालीमार बाग़ मुग़ल दौर में शाहजहानाबाद की चारदीवारी से बाहर स्थित एक शाही पड़ाव हुआ करता था। इसे 1653 ई. में शाहजहाँ के शासनकाल में उनकी बेगम इज़्ज़-उन-निसा—जिन्हें अकबराबादी महल भी कहा जाता था—से जोड़कर देखा जाता है। इसका शुरुआती नाम संभवतः ऐज़्ज़ाबाद बाग़ था। पंजाब, लाहौर या कश्मीर की ओर जाते समय शाही क़ाफ़िले यहाँ ठहरा करते थे।
कभी इस बाग़ में ख़ूबसूरत मंडप, हौज़, फव्वारे, पानी की नहरें और अनेक प्रकार के फलदार पेड़ मौजूद थे। सर सैयद अहमद ख़ान ने आसार-उस-सनादीद में लिखा कि शाहजहाँ ने इसे “शालीमार” नाम दिया था। ये नाम रखने के संबंध में उन्होंने इसे आनंद और ऐश से जोड़कर समझाया, मगर इसे एक universal भाषायी निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। फ़्रांसीसी यात्री François Bernier के विवरण भी इसकी आलीशान इमारतों और दिलकश वातावरण की ओर संकेत करते हैं।
इससे पहले जहाँगीर ने 1619 में कश्मीर में प्रसिद्ध शालीमार बाग़ का निर्माण कराया था। दिल्ली का बाग़ भी मुग़ल चारबाग़ परंपरा से प्रभावित था, लेकिन समय के साथ इसकी नहरें, वृक्ष और अधिकांश शाही संरचनाएँ खत्म होती गईं। आज इसका बड़ा हिस्सा सार्वजनिक पार्क में बदल चुका है। शीश महल और आसपास की ऐतिहासिक संरचनाओं को संरक्षण के बाद 2 जुलाई 2025 को दोबारा जनता के लिए खोला गया।
इस स्थान की सबसे महत्वपूर्ण घटना औरंगज़ेब की पहली तख़्तनशीनी थी। उत्तराधिकार की लड़ाई के बीच वह कुछ समय के लिए आग़राबाद—यानी बाद का शालीमार बाग़—में रुका और नाजुमियों (ज्योतिषियों) द्वारा निर्धारित मुबारक घड़ी में तख़्त पर बैठा। मआसिर-ए-आलमगीरी इसे बुधवार, 21 जुलाई 1658 लिखता है, जबकि ख़ाफ़ी ख़ान के विवरण तथा आधुनिक Gregorian conversion में तारीख़ 31 जुलाई 1658 मिलती है। यहीं औरंगज़ेब ने “आलमगीर” का शाही लक़ब धारण किया।
इस छोटे और जल्दबाज़ी में आयोजित जलसे में शहज़ादों, उमरा, मनसबदारों और अधिकारियों को बड़ी संख्या में तोहफ़े दिए गए। समय कम होने के कारण नए बादशाह के नाम का ख़ुत्बा, शाही सिक्के और दूसरे औपचारिक ऐलान स्थगित कर दिए गए। उत्तराधिकार की लड़ाई में अपनी स्थिति मज़बूत करने के बाद औरंगज़ेब ने अगले वर्ष लाल क़िले में कहीं अधिक भव्य एवं शानदार दूसरा ताजपोशी तक़रीब का इंतखाब किया गया।
ब्रिटिश शासन के दौर में दिल्ली के रेज़िडेंट Sir David Ochterlony ने शीश महल को गर्मियों के निवास के रूप में इस्तेमाल किया; बाद के विवरण Lord Metcalfe को भी इस स्थान से जोड़ते हैं। 1857 की लड़ाई और उसके बाद बाग़ तथा इमारतों को भारी क्षति पहुँची। आज बचा हुआ शीश महल उस मुग़ल बाग़ की अंतिम बड़ी निशानियों में है, जिसने शाही पड़ाव, तख़्तनशीनी, औपनिवेशिक निवास और उजड़ते इतिहास—चारों दौर देखे हैं।

0 Comments
Please do not enter any spam link in the comment box.